फसल प्रबंधन: लवणीय मृदाओं में फसल उगाने की अवधारणा विकसित की गई, जिसमें उत्तर–पश्चिम दिशा में मेड़–नाली (रिज–फरो) विन्यास द्वारा ऊष्मा भार कम किया जाता है।
शुष्क भूमि कृषि: शुष्क क्षेत्रों में गेहूँ, चना एवं सरसों के लिए एक्वा–सॉइंग तकनीकें विकसित की गईं, जिससे फसल स्थापना, उत्पादकता, पोषक तत्व एवं जल उपयोग दक्षता में सुधार हुआ।
जल प्रबंधन: सिंचाई निर्धारण हेतु सनकेन स्क्रीन इवैपोरोमीटर विकसित किया गया, जिससे IW:CPE अनुपात की अवधारणा विकसित हुई।
उर्वरता प्रबंधन: विशेषकर धान में नाइट्रीफिकेशन अवरोधक एवं धीमे विमोचन वाले नाइट्रोजन उर्वरक विकसित एवं परखे गए। धान–गेहूँ तथा मक्का–गेहूँ फसल प्रणालियों में फसल अवशेषों के कुशल उपयोग की तकनीकें विकसित की गईं। बासमती धान एवं सब्ज़ी-आधारित प्रणालियों के लिए जैविक पोषक तत्व प्रबंधन विकसित किया गया।
फसल प्रणालियाँ: रिले क्रॉपिंग (400% तीव्रता) की अवधारणा विकसित की गई। सोयाबीन एवं शीतकालीन मक्का को फसल प्रणाली विविधीकरण हेतु अनुशंसित किया गया।
खरपतवार प्रबंधन: विभिन्न फसलों के लिए एकीकृत खरपतवार प्रबंधन पैकेज विकसित किया गया। गेहूँ में उगने के बाद (पोस्ट-इमर्जेंस) 2,4-D Na सॉल्ट (250 g/ha) + 3% यूरिया कम मात्रा में उतना ही प्रभावी पाया गया जितना 2,4-D Na सॉल्ट (500 g/ha) की उच्च मात्रा।