भा.कृ.अ.प. - भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान | ICAR-Indian Agricultural Research Institute
ICAR-IARI, New Delhi

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भा.कृ.अ.प. - भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान
ICAR-Indian Agricultural Research Institute

आईसीएआर-आईएआरआई, नई दिल्ली

संस्थान का वर्तमान परिसर लगभग 500 हेक्टेयर (लगभग 1250 एकड़) क्षेत्र में फैला एक स्व-निहित एवं हरित परिसर है। यह नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से लगभग 8 किमी (5 मील) पश्चिम तथा पालम स्थित इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से लगभग 16 किमी (10 मील) पूर्व में स्थित है। इसका भौगोलिक स्थान 28.08° उत्तरी अक्षांश एवं 77.12° पूर्वी देशांतर पर है तथा समुद्र तल से इसकी ऊँचाई 228.61 मीटर (750 फीट) है। यह पहाड़ी सड़क के समीप स्थित है। यहाँ की जलवायु उप-समशीतोष्ण एवं अर्ध-शुष्क है। ग्रीष्म ऋतु (मई–अक्टूबर) के दौरान औसत अधिकतम दैनिक तापमान 32.2°C से 40.0°C तक तथा औसत न्यूनतम तापमान 12.2°C से 27.5°C के बीच रहता है। जून से सितंबर तक वर्षा ऋतु रहती है, जिसमें लगभग 500 मिमी वर्षा होती है। शीत ऋतु मध्य नवंबर से प्रारंभ होती है और अत्यंत सुखद रहती है। शीतकाल (नवंबर–मार्च) में औसत अधिकतम तापमान 20.1°C से 29.1°C तथा औसत न्यूनतम तापमान 5.6°C से 12.7°C के बीच रहता है। इस अवधि में लगभग 63 मिमी वर्षा होती है। संस्थान में दिल्ली में स्थित 20संभाग, 5 बहु-विषयक केंद्र, 8 क्षेत्रीय केंद्र, 2 ऑफ-सीजन नर्सरियाँ, भा. कृ. अनु. सं. मुख्यालय सहित 3 अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजनाएँ तथा इनके अंतर्गत कार्यरत 10 राष्ट्रीय केंद्र हैं। संस्थान की स्वीकृत कार्मिक संख्या 3540 है, जिसमें वैज्ञानिक, तकनीकी, प्रशासनिक एवं सहायक कर्मचारी शामिल हैं।
 
क्षेत्रीय केंद्रों का विकास

1939 में क्षेत्रीय समस्याओं के समाधान हेतु क्षेत्रीय केंद्रों की अवधारणा उभरी। इसके अंतर्गत संस्थान ने पूसा (बिहार), सिरसा एवं करनाल (हरियाणा), शिमला एवं कटराईं (हिमाचल प्रदेश), भवाली (उत्तराखंड), वेलिंगटन (तमिलनाडु), इंदौर (मध्य प्रदेश), कालिम्पोंग (पश्चिम बंगाल) तथा पुणे (महाराष्ट्र) में क्षेत्रीय केंद्र स्थापित किए। प्रारंभ में कानपुर और हैदराबाद के केंद्र पी-आई-आर-आर-कॉम स्टेशन थे, जिन्हें बाद में क्षेत्रीय केंद्रों का दर्जा दिया गया। इन केंद्रों में उद्यानिकी प्रौद्योगिकी, गेहूँ एवं जौ प्रजनन, विषाणु अनुसंधान, बीज प्रौद्योगिकी, दलहन अनुसंधान आदि विषयों पर मौलिक एवं रणनीतिक अनुसंधान किया गया। क्षेत्रीय केंद्रों का दायित्व देशभर के वैज्ञानिकों को सामग्री, प्रौद्योगिकी अथवा ऑफ-सीजन नर्सरियों के रूप में आवश्यक सहयोग प्रदान करना है। अदुथुरई (तमिलनाडु) एवं धारवाड़ (कर्नाटक) स्थित दो केंद्र ऑफ-सीजन नर्सरियों के रूप में कार्य करते हैं। शिमला के फ्लावरडेल स्थित भा. कृ. अनु. सं. क्षेत्रीय केंद्र, जिसे गेहूँ में रस्ट रोगों के विरुद्ध प्रजनन कार्यक्रम के समर्थन हेतु राष्ट्रीय सुविधा के रूप में स्थापित किया गया था, बाद में करनाल स्थित गेहूँ अनुसंधान निदेशालय को हस्तांतरित कर दिया गया। इसी प्रकार, कानपुर, सिरसा एवं भवाली के भा. कृ. अनु. सं. क्षेत्रीय केंद्रों को क्रमशः भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान, केंद्रीय कपास अनुसंधान संस्थान तथा विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधानशाला को सौंप दिया गया। संभागों का विकास ब्रिटिश काल में स्थापित प्रारंभिक पाँच अनुभागों को 1945 में संभागों का रूप दिया गया। स्वतंत्रता के पश्चात भा. कृ. अनु. सं. तथा इसके संभागों का तीव्र विस्तार हुआ। वर्तमान में अनुसंधान गतिविधियाँ 19 संभागों के माध्यम से संचालित की जाती हैं। संभागों के इस विकास ने भा. कृ. अनु. सं. को न केवल भारत बल्कि विश्व के सबसे बड़े कृषि अनुसंधान संस्थानों में से एक बना दिया है। विशिष्ट प्रयोगशालाओं का विकास सामान्य प्रभागीय प्रयोगशालाओं के साथ-साथ संस्थान ने कृषि विज्ञान के सभी क्षेत्रों में अत्याधुनिक एवं विशिष्ट प्रयोगशालाएँ विकसित की हैं। अंतर्विषयी एवं उन्नत अनुसंधान की आवश्यकता को देखते हुए निम्नलिखित सुविधाएँ स्थापित की गईं: 1969 में बहु-विषयक इकाई के रूप में नाभिकीय अनुसंधान प्रयोगशाला की स्थापना की गई। 1970 में जल प्रौद्योगिकी केंद्र की स्थापना जल, मृदा एवं फसल के एकीकृत प्रबंधन तथा जल प्रबंधन अभियांत्रिकी पर अनुसंधान एवं प्रशिक्षण हेतु की गई। 1985 में देश का राष्ट्रीय पादप जैव-प्रौद्योगिकी केंद्र स्थापित किया गया, जो आणविक जीवविज्ञान, रिकॉम्बिनेंट डीएनए, जीन एवं जीनोम की क्लोनिंग व अनुक्रमण, ऊतक संवर्धन, पादप रूपांतरण एवं सोमैटिक हाइब्रिडाइजेशन जैसे क्षेत्रों में अत्याधुनिक उपकरणों से सुसज्जित है। 1988 में पादप रोग विज्ञान संभाग में उन्नत पादप विषाणु विज्ञान केंद्र की स्थापना की गई, जिसका उद्देश्य आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण पादप विषाणुओं एवं विषाणु-सदृश रोगजनकों पर मूलभूत ज्ञान का सृजन करना है। यह केंद्र इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी, मोनोक्लोनल एवं पॉलीक्लोनल एंटीबॉडी निर्माण, विषाणु जीनोमिक्स की क्लोनिंग एवं अनुक्रमण, रोग निदान तथा पादप रूपांतरण के लिए सुसज्जित प्रयोगशालाओं से युक्त है। संस्थान के पास स्कैनिंग इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप भी उपलब्ध हैं। संस्थान ने स्थापना के प्रारंभ से ही जैव-विविधता एवं पारिस्थितिक संतुलन के महत्व को समझते हुए 1905 में हर्बेरियम क्रिप्टोगामी इंडियाए ओरिएंटालिस (HCIO) तथा राष्ट्रीय पूसा कीट संग्रह की स्थापना की। इसके पश्चात भारतीय फफूंद प्रकार संस्कृति संग्रह (1936), राष्ट्रीय नेमाटोड संग्रह तथा राष्ट्रीय राइजोबियल संग्रह (1986) की स्थापना की गई। ये सभी संग्रह राष्ट्रीय धरोहर हैं और संस्थान की पहचान के प्रतीक हैं। इसके अतिरिक्त, संस्थान ने नीली-हरित शैवाल एवं अजोल्ला के संरक्षण एवं उपयोग हेतु राष्ट्रीय सुविधा भी विकसित की है। भा. कृ. अनु. सं. के पास खाद्य, चारा, सब्जी एवं फल फसलों का विशाल जर्मप्लाज्म संग्रह भी उपलब्ध है। 1997 में राष्ट्रीय फाइटोट्रॉन सुविधा की स्थापना की गई, जो देश में अपनी तरह की पहली सुविधा है। इसका उद्देश्य नियंत्रित परिस्थितियों में पौधों की जीवित प्रतिक्रियाओं तथा जलवायु परिवर्तन एवं ग्रीनहाउस गैसों के संभावित प्रभावों का अध्ययन करना है। संस्थान की बीज परीक्षण प्रयोगशाला को कृषि मंत्रालय द्वारा केंद्रीय बीज परीक्षण प्रयोगशाला (CSTL) का दर्जा प्राप्त है और यह देशभर में स्थित 96 राज्य बीज परीक्षण प्रयोगशालाओं के लिए संदर्भ प्रयोगशाला के रूप में कार्य करती है। राज्य बीज परीक्षण प्रयोगशालाओं के कार्मिकों के लिए नियमित प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। 1998 में भारत–इज़राइल सहयोग के अंतर्गत संरक्षित उद्यानिकी के लिए अत्याधुनिक सुविधाओं से युक्त एक विशाल परिसर विकसित किया गया, जो उद्यानिकी के छात्रों एवं वैज्ञानिकों के लिए अत्यंत उपयोगी है और कुशल कृषि का एक आदर्श प्रस्तुत करता है। इसके अतिरिक्त, जलवायु परिवर्तन से संबंधित वर्तमान कृषि चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए जलवायु-समुत्थानशील कृषि पर अनुसंधान हेतु एक केंद्र (CESCRA) की स्थापना की गई, जिसका उद्देश्य कृषि से संबंधित पर्यावरण विज्ञान के घटकों में हो रहे परिवर्तनों को ध्यान में रखते हुए समाधान विकसित करना है।

भा.कृ.अनु.प –भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान


पूसा परिसर,
नई दिल्ली - 110012
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