भा.कृ.अ.प. - भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान | ICAR-Indian Agricultural Research Institute
ICAR-IARI, New Delhi

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भा.कृ.अ.प. - भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान
ICAR-Indian Agricultural Research Institute

मूल विज्ञान

जैव रसायन विज्ञान
सोया तेल की शेल्फ लाइफ एवं पोषण गुणवत्ता में सुधार
सोया तेल में लगभग 20–30% ओलिक अम्ल तथा 50–55% लिनोलिक अम्ल होता है। सोया तेल की शेल्फ लाइफ और पोषण गुणवत्ता बढ़ाने के लिए बहु-असंतृप्त वसीय अम्ल (लिनोलिक अम्ल) की मात्रा कम करना तथा साथ ही एकल-असंतृप्त वसीय अम्ल (मुफा/MUFA) यानी ओलिक अम्ल की मात्रा बढ़ाना वांछनीय है। इस उद्देश्य से सोयाबीन बीज से फैड(fad2-1) जीन को पृथक कर उसका वर्णन किया गया है। इसके सेंस एवं एंटी-सेंस कंस्ट्रक्ट उपयुक्त वेक्टर में तैयार किए जा रहे हैं, जिनका उपयोग आगे चलकर कम लिनोलिक अम्ल वाले ट्रांसजेनिक सोयाबीन विकसित करने में किया जा सकता है।
डिज़ाइन्ड ऑयल के जैवसंश्लेषण हेतु लिपिड चयापचय से जुड़े जीनों का पृथक्करण एवं वर्णन
पौधे बीजों में ऊर्जा का भंडारण ट्राइएसिलग्लिसरॉल के रूप में करते हैं। ट्राइएसिलग्लिसरॉल के संश्लेषण में संलग्न जीन को Brassica juncea से पृथक कर उसका वर्णन किया गया है। कुछ जीन अपने सब्सट्रेट के प्रति अत्यधिक विशिष्ट होते हैं; ऐसे जीनों का उपयोग तेल जैवसंश्लेषण के आनुवंशिक संशोधन में कर विशिष्ट वसीय अम्ल संयोजन वाले डिज़ाइन्ड ऑयल प्राप्त किए जा सकते हैं, जो विभिन्न औद्योगिक उपयोगों के लिए उपयुक्त होंगे। ऐसे तेलों की औद्योगिक मांग अधिक होगी और अंततः किसानों की आय में वृद्धि होगी।
फसली पौधों की CO (कार्बन मोनोऑक्साइड) के प्रति संवेदनशीलता
(सी 4)C4 फसलें (जैसे मक्का/कॉर्न) प्रदूषकों, विशेषकर कार्बन मोनोऑक्साइड, के प्रति (सी 3)C3 फसलों (जैसे गेहूँ, धान) की तुलना में अधिक संवेदनशील होती हैं। इसलिए शहरी क्षेत्रों तथा अत्यधिक उपयोग वाले राष्ट्रीय राजमार्गों के आसपास (सी 4)C4 फसलों की खेती से बचना एक उपयोगी अभ्यास हो सकता है, जो किसानों के लिए लाभकारी सिद्ध होगा।
सूक्ष्मजीव विज्ञान
जैव उर्वरक उत्पादन प्रौद्योगिकी
जैव उर्वरक लाभकारी सूक्ष्मजीवों के उत्पाद होते हैं, जो विशेषकर नाइट्रोजन और फॉस्फोरस की आपूर्ति के माध्यम से कृषि उत्पादन बढ़ाते हैं। इस संभाग ने विभिन्न फसलों के लिए उपयुक्त इनोकुलेंट/जैव उर्वरक उत्पादन की तकनीकें विकसित की हैं। ये जैव उर्वरक कम लागत, सरल उपयोग और पर्यावरण प्रदूषण से मुक्त होते हैं। रासायनिक तथा अन्य जैविक पोषक स्रोतों के साथ जैव उर्वरकों का विवेकपूर्ण उपयोग और उचित प्रबंधन से न केवल उत्पादकता एवं मृदा स्वास्थ्य बनाए रखने में, बल्कि विभिन्न फसलों की उर्वरक आवश्यकता का आंशिक पूरक बनने में भी उत्साहजनक परिणाम मिले हैं। संभाग ने विभिन्न फसलों के लिए उच्च दक्षता वाले चयनित बैक्टीरिया पर प्रयोग किए हैं और उनका संरक्षण किया है, जिन्हें बीज उपचार में उपयोग किया जा सकता है ताकि पौध वृद्धि के दौरान जड़ क्षेत्र में पर्याप्त मात्रा में बैक्टीरिया उपलब्ध रहें और वृद्धि को प्रभावित कर सकें। ये इनोकुलेंट बाज़ार में विभिन्न फॉर्मुलेशन में उपलब्ध हैं, जिनकी भंडारण क्षमता और उपयोग अलग-अलग कृषि-जलवायु परिस्थितियों में भिन्न-भिन्न लाभ देती है। बीज उपचार या मृदा में प्रत्यक्ष प्रयोग हेतु आवश्यक मात्रा तथा प्रयोग विधि फसल/मृदा पर निर्भर करती है।
नाभिकीय अनुसंधान प्रयोगशाला
पल्स्ड (एन एम आर) NMR स्पेक्ट्रोमीटर का उपयोग कर तिलहनों में तेल की मात्रा तथा रबर लेटेक्स में शुष्क रबर मात्रा का त्वरित एवं गैर-विनाशकारी मापन विकसित किया गया। गेहूँ में टिलरिंग अवस्था पर सूखा सहनशीलता के लिए त्वरित स्क्रीनिंग विधि विकसित की गई, जो पत्ती जल स्पिन-लैटिस रिलैक्सेशन समय (टी 1)पर आधारित है; इसका उपयोग प्रजनकों द्वारा सूखा-सहनशील जीनोटाइप विकसित करने में किया गया। NMR द्वारा पत्ती जल रिलैक्सेशन समय (टी 1, टी 2 / T1, T2), सापेक्ष जल सामग्री (RWC), पत्ती झिल्ली क्षति तथा कैनोपी एयर टेम्परेचर डिफरेंस (CATD) जैसे सरल लक्षणों को ब्रेड गेहूँ में उच्च ताप एवं सूखा तनाव के अनुकूलन से जोड़ा गया। प्राइम्ड गाजर एवं टमाटर बीजों के बेहतर प्रदर्शन को बीज जल-बाइंडिंग तथा चयापचय गतिविधियों हेतु आवश्यक मैक्रोमॉलिक्यूलर हाइड्रेशन बढ़ाने वाली जल पुनर्संरचना के आधार पर स्पष्ट किया गया। स्थिर चुंबकीय क्षेत्र के संपर्क से नमी-तनावग्रस्त मक्का पौधों में पत्ती क्षेत्र, जड़ लंबाई, जड़ सतह क्षेत्र तथा जड़/तना अनुपात में उल्लेखनीय वृद्धि हुई—जिसका वर्षा-आश्रित कृषि में उपयोग संभव है। माइक्रोवेव ऊर्जा से चारा दलहनी Stylosanthes seabrana में कठोर आवरण निष्क्रियता कम हुई और अंकुरण 7% से 46% तक बढ़ा। सूखा-सहनशील जीनोटाइप में बीज जल अवशोषण, प्रसरणशीलता, T2, तथा जल-बाइंडिंग साइट्स की संख्या संवेदनशील जीनोटाइप की तुलना में अधिक पाई गई।
पादप कार्यिकी
A. ओपन टॉप चैंबर तकनीक (OTC)
B. फ्री एयर कार्बन डाइऑक्साइड एनरिचमेंट तकनीक (FACE)
सल्फो-सैलिसिलिक अम्ल द्वारा ग्लैडियोलस के कट फूलों की वेस लाइफ में वृद्धि
1-मेथाइलसाइक्लोप्रोपीन (1-MCP) द्वारा टमाटर फलों के पकने में विलंब
उपयुक्त किस्मों के चयन द्वारा गेहूँ में गिराव (लॉजिंग) सहनशीलता बढ़ाना

भा.कृ.अनु.प –भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान


पूसा परिसर,
नई दिल्ली - 110012
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